आर.पी.आई. वाले तो चुनावों में खड़े होने के भी पैसे लेते हैं, और बैठने के भी --साहेब कांशी राम.
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बंगा --नवांशहर ( पंमी लालोमज़ारा ) पंजाब :-
बात 1971 की है. साहेब जालंधर संसदीय सीट से आर.पी.आई. के हाथी के चुनाव निशान से चुनाव लड़ रहे (फिल्लौर के नज़दीक एक गाँव) एक व्यक्ति की मदद करने के लिए पुणे से एक हज़ार रुपये सहायता फण्ड लेकर पहुंचे. साहेब दोआबा (पंजाब के एक क्षेत्रीय भाग) के उस ‘अम्बेडकरवादी लेखक’ को साथ लेकर जाना चाहते थे जिसने 1985 के पंजाब विधान सभा चुनावों में साहेब को एक पम्फलेट के माध्यम से जी भरकर निंदा प्रचार करने की कोशिश की थी. दूसरी बात, इस लेखक व्यक्ति की एक बुरी बात तब सामने आई जब साहेब अप्रैल 1985 में इंग्लैंड के दौरे पर गए थे तो इस इंसान ने इंग्लैंड की अम्बेडकरवादी संस्थाओं और अन्य जथेबंदियों को चिट्ठियां लिखकर साहेब के इंग्लैंड पहुँचने से पहले ही, उनके कान भरने की कोशिश की कि कांशी राम इंग्लैंड से पैसा एकत्रित करने आ रहा है, और उसे कोई पैसा न दिया जाये. जबकि साहेब ने इंग्लैंड के फ़क़ीर चंद चौहान (साहेब को स्पोंसर करने वाला व्यक्ति) और उसके साथियों को पहले ही साफ़ कर चुके थे कि इस दौरे के दौरान मुझे (कांशी राम) कोई पैसा न दिया जाये, और जिसने भी मदद करनी है वह सीधा दिल्ली दफ्तर में संपर्क करे.
साहेब, जब अमेरिका के दौरे पर गए थे तब उनकी उस वक़्त भी वहां के साथियों को यह कहकर सुचेत कर दिया था कि भारत की ख़ुफ़िया एजंसियाँ तो मेरा संबंध पहले ही अमरीका की ख़ुफ़िया एजेंसी सी.आई.ए. के साथ जोड़ने को तत्पर बैठी हैं. हालाँकि सरदार हरबलास सिंह ‘झिंगड़’ ने खुलासा करते हुए कहा था कि जब साहेब 1965-66 के करीब पुणे से जालंधर खास तौर पर इस ‘अम्बेडकरवादी लेखक’ से पढने के लिए ढेर सारी किताबें लेकर आया करते थे तो यही लेखक साहेब के यह कहकर प्रशंसा के गीत गाता था कि ‘जिस हिसाब से यह लड़का स्टडी करता है और समाज के लिए कुछ करने का जज़्बा रखता है, ज़रूर एक दिन दुनिया इस लड़के के पीछे पीछे घूमेगी.’
जैसे जैसे दिन-ब-दिन यह सपना ने अंगडाई भरना शुरू किया, उसी दिन से इस ‘अम्बेडकरवादी लेखक’ ने अपने लेखन में साहेब को नीचा दिखाने की कोशिश करने लगा. असल में उसकी मानसिकता यह बन गई थी कि ‘यदि बाबा साहेब का मिशन कांशी राम ‘हाईजैक’ करके ले गया तो फिर हम तो ‘हाशिये’ पर चले जायेंगे.’ हुआ भी कुछ यूं ही. साहेब ने मिशन को तो क्या हाईजैक करना था, लेकिन उन्होंने अपने काम से एक लंबी लकीर खींची जिसके सामने बाकी लकीरें छोटी पड़ गईं.
साहेब ने इस लेखक के बारे में एक और गिला करते हुए कहा था, ‘इस व्यक्ति ने अखबारों, पत्रिकाओं के लगभग 80 संपादकों को एकत्रित करके पूरे मुल्क में मेरा विरोध किया. मैं बाबा साहेब के मिशन को पार लगाने के लिए लोगों को इकठ्ठा करता रहा और दोआबा (पंजाब के एक क्षेत्र) का यह ‘अम्बेडकरवादी लेखक’ किताबें इकट्ठी करता रहा. लेकिन इसका नतीजा यह निकला कि मेरा कुछ भी बिगड़ा नहीं, और उस लेखक का कुछ रहा नहीं.’
बहरहाल, आखिर साहेब जब उस ‘अम्बेडकरवादी लेखक’ के पास पहुंचे और उससे कहा कि ‘मैं यह एक हज़ार रुपए उस व्यक्ति की चुनावों में मदद करने के लिए पुणे से इकठ्ठा करके लाया हूँ, और हम लोग साथ में जाकर उसे दे देते हैं’ तो उस लेखक ने प्रतिक्रिया देते हुए कहा, ‘कांशी राम! तेरा दिमाग तो खराब नहीं हो गया? हमने तो उससे पैसे लेने हैं न कि देने हैं.’ साहेब ने हैरान होते हुए पूछा, ‘वह कैसे?’
लेखक ने खुलासा करते हुए कहा, ‘अभी कल ही उसे जालंधर से छपते एक हिंदी अखबार वाले 25000 रुपए देकर गए हैं प्रचार के लिए. ताकि कांग्रेस का उम्मीदवार जीत जाए. साहेब मन ही मन कहने लगे, ‘इसका मतलब तो यह हुआ कि आर.पी.आई. वाले खड़े होने के भी पैसे लेते हैं और बैठने के भी.’
1992 में सतनाम सिंह कैंथ और उसके समर्थकों ने साहेब को मिलकर आर.पी.आई. पंजाब के एक और थैंक टिंक रहे ( फिल्लौर के नजदीक ही एक गाँव का रहने वाला )नेता को बसपा के माध्यम से संसदीय चुनाव लड़वाने का निवेदन किया तो साहेब ने कहा कि ‘मुझसे टिकट लेने के लिए वह खुद क्यूँ नहीं आया?’ सतनाम सिंह कैंथ ने जवाब दिया, ‘साहेब जी, उसमे इतनी हिम्मत कहाँ कि आपके सामने आये?’ साहेब मुस्कुराते हुए कहने लगे, ‘मैं कौन सा उसके गोली मार देनी है. मैं तो उसे केवल इतना ही पूछना है कि ऊठक-बैठक ( मतलब के किसी दुसरी पार्टी से अंदरखाने पैसे लेकर बैठना तो नहीं है ) तो नहीं करनी अब?’
* ऊठक-बैठक करने वालों की सेहत तो अच्छी-खासी बन गई लेकिन बहुजन समाज के लोगों की सेहत दिनों-दिन कमज़ोर होती चली गई- साहेब कांशी राम
( मैं कांशीराम बोल रहा हूं " किताब लेने के लिए संपर्क करें लेखक पंमी लाल़ो मजारा बंगा-नवांशहर पंजाब ) 9501143755.

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