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पंजाब के दलितों के मसीहा बाबू मंगूराम मुगोवालिया जी

पंजाब के दलितों के मसीहा बाबू मंगूराम मुगोवालिया जी मंगूराम (जन्म- 14 जनवरी, 1886, होशियापुर ज़िला, पंजाब; मृत्यु- 22 अप्रैल, 1980) समाज सुधारक के रूप में कार्य करते थे। बाबू मंगूराम जी का जन्म होशियापुर ज़िले के मुगोवल गांव में एक गरीब दलित परिवार में हुआ था। उनके घर में चमड़े का काम होता था और बचपन में मंगूराम जी ने भी इसमें अपने पिता का हाथ बंटाया। परंतु मंगूराम जी की इच्छा पढ़ने की थी। पर गरीब होने, विशेषत: उनकी जाति के कारण उन्हें इसकी सुविधा नहीं थी। संयोग से बालक मंगूराम का संपर्क एक साधु से हुआ और उनकी लगन देखकर साधु ने पहले स्वयं उन्हें पढ़ाया। फिर दूर के एक स्कूल में और कुछ समय देहरादून में भी पढ़ने का अवसर मिला। दलित वर्ग का होने के कारण मंगूराम को कक्षा के अंदर नहीं बैठने दिया जाता था। वे बाहर खिड़की से भीतर देखकर पढ़ाई किया करते थे। एक बार तेज बारिश हो रही थी और साथ ही आंधी आ गई। बालक मंगूराम अपना छाता ओढ़े बाहर बैठे थे। तेज हवा से उनका छाता टूट गया और वो बारिश से बचने के लिए कमरे के अंदर चले गए। अध्यापक ने इस गुनाह के बदले उन्हें पीटा भी। दूसरे दिन जब वो स्कूल गए तो उनके अध्यापक पोलो राम कमरे को धुलवा रहे थे क्योंकि उसको एक अछूत ने अपवित्र कर दिया था। इसके बाद बाबू जी ने स्कूल जाना छोड़ दिया। मंगूराम जी दोआबा क्षेत्र के दूसरे लोगों की तरह विदेश जाने का अवसर मिला। वहां उनके संबंध गदर पार्टी के साथ हो गए। पकड़े जाने पर उन्हें तोप से उड़ाए जाने का फैसला हुआ लेकिन साथियों ने किसी तरह उनको बचा लिया। 1925 में मंगूराम भारत लौटे। उन्होंने देश के कई स्थानों का दौरा किया और अपने वर्ग के लोगों की दुर्दशा देखी। मदुरा के मीनाक्षी मंदिर में मंगूराम जी को प्रवेश नहीं मिला। पंजाब लौटकर मंगूराम जी ने अछूतों में शिक्षा प्रचार के लिए सबसे पहले अपने गांव में स्कूल खोला जिसका नाम रखा 'आदि धर्म स्कूल'। बाद में 'आदि धर्म मंडल' के नाम से पूरे पंजाब में उसकी शाखाएं खुलीं और समाज सुधार का कार्य आगे बढ़ा। यह आंदोलन मानव-मानव को परस्पर भाईचारे के बंधन में बांधने का एक प्रयत्न था। इनके प्रयत्न से अनुसूचित जाति के विद्यार्थियों को स्कूल, कॉलेजों में प्रवेश मिलने लगा। जालंधर में आदि धर्म मंडल का दफ्तर बनाया गया। प्रचार प्रसार के लिए "आदि डंका" नाम का एक समाचार पत्र भी निकाला गया।
पंजाब में अंग्रेज़ों ने 1890 ई. में 'लैंड एलिएनेशन एक्ट' बनाया था। इसके अनुसार अनुसूचित जाति के लोगों को गैर-किसान घोषित करके उनके द्वारा खेती की जमीन की ख़रीद पर रोक लगा रखी थी। जब बाबू जी के परिवारिक सदस्यों से किसी जमींदार ने अपने खेत से काटी घास और घास काटने वाली दात्री बगैरह रखवा लिए और बेइज्जत करके खेत से निकाल दिया तो उनको इसका सदमा पहुंचा। बाबू मंगूराम जी ने इस कानून के विरोध में आवाज उठाई और अदालत ने अनुसूचित जाति के लोगों को खेती की जमीन खरीदने की मान्यता दे दी। यह बहुत बड़ी सफलता थी। मंगूराम जी के प्रयत्नों से दलितों में शिक्षा का भी प्रचार हुआ। जब 1937 को देश में पहली बार चुनाव हुए तो पंजाब की आठ आरक्षित सीटों में से सात सीटों पर आदि धर्म मंडल के उम्मीदवारों ने जीत हासिल कर ली। जो सीट हारे वहां भी बहुत कम मतों से हार हुई। इससे विरोधियों के कान खड़े हो गए और उन्होंने आदि धर्म मंडल में फूट डलवा दी। 22 अप्रैल, 1980 को आज के दिन बाबू मंगूराम जी का निधन हो गया। पंजाब के लोग सदैव बाबू जी के आभारी रहेंगे।

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