आज दुनिया भर में मजदूर दिवस मनाया जा रहा है। 1 मई को दुनिया मेहनतकश तबके की मेहनत को सलाम करती है लेकिन क्या आप जानते हैं कि भारत में मजदूरों की लड़ाई का श्रेय किसको जाता है वह कौन है जिसने मजदूरों के काम के घंटों से लेकर इंश्योरेंस की लड़ाई लड़ी ! जवाब है डॉक्टर बी आर अंबेडकर आइए आपको बताते हैं कि बाबा साहब ने मजदूर वर्ग के लिए क्या कुछ किया
*आज भारत में काम के 8 घंटे हैं तो इसका श्रेय बाबा साहब को ही जाता है 27 नवंबर 1942 को हुई सातवीं लेबर कॉन्फ्रेंस में बाबासाहेब ने काम के घंटे 14 से घटाकर आठ कर दिए उससे पहले भारत में मजदूरों को 14 से 15 घंटे काम करना पड़ता था। बिल पेश करते हुए बाबा साहब ने कहा था काम के घंटे घटाने का मतलब है रोजगार का बढ़ना लेकिन काम का समय 12 से 8 घंटे किए जाते समय वेतन काम नहीं किया जाना चाहिए(27 नवंबर 1942)
• मजदूरों को दुर्घटना बीमा दिया
• प्रोविडेंट फंड
• टीए और डीए
•मेडिकल लीव जैसे बेनिफिट्स भी दिलाऐ।
बाबासाहेब ने मजदूरों की भलाई के लिए खुद 10 बिल ड्राफ्ट किए। उन्होंने:
°द कूल साइंस सेफ्टी (स्टाॅविंग) बिल
°द फैक्ट्री (अमेंडमेंट) बिल
°द फैक्ट्रीज (सेकंड अमेंडमेंट) बिल
°वर्तमान कंम्पेनसेशन (अमेंडमेंट) बिल
°द इंडियन माइंस (अमेंडमेंट) बिल
°वर्कर्स वेलफेयर एंड सोशल सिक्योरिटी बिल
°मीका माइंस वेलफेयर बिल
°इंडस्ट्रियल वर्कर्स हाउसिंग एंड हेल्थ बिल
°टी कंट्रोल अमेंडमेंट बिल जैसे कानून भी लाए।
आज के नेता ऐ सी कमरों में बैठकर नीतियां बनाते हैं लेकिन बाबा साहब खुद ग्राउंड जीरो पर पहुंचते थे। बाबासाहेब ने खुद धनबाद कोल माइंस, रानीगंज कोल फील्ड का दौरा किया और खदानों में काम करने वाले मजदूरों की हालत पर विस्तृत रिपोर्ट भी बनाई।
*9 अप्रैल 1946 को बाबासाहेब मीका माइंस लेबर वेलफेयर फंड बिल लेकर आए ताकि मजदूरों की भलाई के लिए अलग से एक फंड बनाया जा सके।
*29 जुलाई 1943 को बाबा साहब कई और बेल लेकर आए माइंस में काम करने वाली महिलाओं के लिए महेश मेटरनिटी बेनिफिट (अमेंडमेंट) बिल लेकर आए और उसे पास कराया ताकि बच्चा पैदा होने पर महिला को मातृत्व अवकाश मिले और उसका वेतन भी ना कटे माइंस मेटरनिटी बेनिफिट (अमेंडमेंट) बिल पर बोलते हुए बाबा साहब ने कहा था "यह काम से अनुपस्थित या काम से शब्द को हटाने के लिए है, जो मातृत्व लाभ अधिनियम की धारा 5 से अस्पष्टता का कारण बनता है और इस खंड को इस आशय को पढ़ने के लिए सलाह दी जाती है कि 4 सप्ताह से पहले हर दिन महिला को प्रसव से पहले मातृत्व लाभ का हक हो। (29 जुलाई 1943, माइंस मेटरनिटी बेनिफिट अमेंडमेंट बिल)
*साथ ही मर्दों के साथ महिलाओं को सम्मान वेतन दिलाने के लिए भी बाबा साहेब ने संघर्ष किया था।असेंबली में बोलते हुए बाबा साहब ने कहा था हमें इसका भी ख्याल रखना चाहिए कि महिलाओं को भी पुरुषों के समान वेतन मिले। मुझे लगता है कि यह पहली बार है जब किसी इंडस्ट्री में समान काम के लिए समान वेतन देते हैं का सिद्धांत लागू किया गया है वह भी बिना किसी लैंगिक भेदभाव के हमें इसका भी ध्यान रखना होगा कि महिलाएं उस गलियारों में काम ना करें जो साढ़े 5 फीट से छोटा हो (doctor Ambedkar as member of the Governor- General's executive council 1942- 46 {Vol - 10, Page no 143}) इससे पहले जोखिम भरी जगहों पर भी महिलाओं से काम कराया जाता था
• खदान मातृत्व लाभ कानून
• महिला कल्याण कोष
• महिला एवं बाल श्रमिक सरंक्षण कानून
• महिला मजदूरों के लिए मातृत्व लाभ कानून के साथ-साथ उन्होंने
•भूमिगत कोयला खदानों में महिलाओं के काम की मनाही के कानून की बहाली भी कराई।
*बाबा साहब लेबर यूनियन को भी अहम मानते थे ट्रेड यूनियन एक्ट भले 1926 में बन गया था लेकिन मालिकों द्वारा श्रमिक संगठनों को मान्यता देने को अनिवार्य बनाने का कानूनी संशोधन 1943 में हुआ। 13 नवंबर 1943 को बाबा साहब इंडियन ट्रेड यूनियन (अमेंडमेंट) बिल लेकर आए थे ताकि फैक्ट्री मालिक ट्रेड यूनियन को मान्यता दें इसी समय काम करते समय दुर्घटना का बीमा जिसे बाद में ई एस आई का रूप मेला कानून बना, इसी समय बने कोयला और मीका कर्मचारियों के प्रोविडेंट फंड और सारे मजदूरों के प्रोविडेंट फंड भी अस्तित्व में आए
*बाबासाहेब ने 15 अगस्त 1936 को इंडिपेंडेंट लेबर पार्टी की स्थापना की थी उसके टिकट पर वह निर्वाचित हुए और 7 नवंबर 1938 को एक लाख से ज्यादा मजदूरों की हड़ताल का नेतृत्व भी डॉक्टर अंबेडकर ने किया था इस हड़ताल के बाद सभा को संबोधित करते हुए उन्होंने मजदूरों का आवाहन किया के मजदूर मौजूदा लेजिसलेटिव काउंसिल में अपने प्रतिनिधियों को चुनकर सत्ता अपने हाथों में ले लऐ 7 नवंबर की हड़ताल से पहले 6 नवंबर 1938 को लेबर पार्टी द्वारा बनाई गई इस मीटिंग में बड़ी संख्या में मजदूरों ने हिस्सा लिया अंबेडकर स्वयं खुली कार से श्रमिक क्षेत्रों का व्रमण कर हड़ताल सफल बनाने की अपील कर रहे थे यह हड़ताल डॉक्टर अंबेडकर ने मजदूरों के हड़ताल करने के मौलिक अधिकार की रक्षा के लिए बुलाई थी दरअसल (सितंबर 1938) को मुंबई विधान मंडल में पार्टी की सरकार ने औद्योगिक विवाद विधेयक प्रस्तुत किया था इस विधेयक के तहत कांग्रेसी सरकार ने हड़ताल को अपराधिक कार्यवाही की श्रेणी में डालने का प्रस्ताव किया था डॉक्टर अंबेडकर ने विधानमंडल में इस विधेयक का विरोध करते हुए कहा " हड़ताल करना सिविल अपराध है फौजदारी गुना नहीं किसी भी आदमी से उसकी इच्छा के विरुद्ध काम लेना किसी भी दृष्टि से उसे दास बनाने से कम नहीं माना जा सकता है श्रमिक को हड़ताल के लिए दंड देना उसे गुलाम बनाने जैसा है हड़ताल एक मौलिक स्वतंत्रता है जिस पर मैं किसी भी सूरत में अंकुश नहीं लगने दूंगा यदि स्वतंत्रता कांग्रेसी नेताओं का अधिकार है तो हड़ताल भी श्रमिकों का पवित्र अधिकार है (सितंबर 1938) डॉक्टर अंबेडकर के विरोध के बावजूद कांग्रेस ने बहुमत का फायदा उठाकर इस बिल को पास करा लिया था अंबेडकर ने इसे काले विधेयक के नाम से पुकारा इसी विधेयक के विरोध में डॉक्टर अंबेडकर की अगुवाई में लेबर पार्टी ने 7 नवंबर 1938 की हड़ताल बुलाई थी
*17 सितंबर 1937 को उन्होंने म्हारो को गुलाम बनाए रखने के लिए चली आ रही वतन प्रथा खत्म करने के लिए एक विधेयक पेश किया था वतन प्रथा के तहत थोड़ी सी जमीन के बदले म्हारो को पूरे गांव के लिए श्रम करना पड़ता था और अन्य सेवा देनी पड़ती थी एक तरह से वह पूरे गांव के बंधुआ मजदूर होते थे इस विधेयक में यह भी प्रावधान था कि म्हारो को जमीन से बेदखल ना किया जाए जो गांव की सेवा के बदले में भुगतान के तौर पर उन्हें मिली हुई थी।
मजदूरों और किसानों के संघर्ष की अगबाई करते हुए डॉक्टर अंबेडकर ने सोशलिस्टो और कम्युनिस्टों का भी सहयोग लिया लेकिन यह सहयोग ज्यादा दिनों तक नहीं चल पाया क्योंकि कम्युनिस्ट और सोशलिस्ट पूंजीवाद को दुश्मन मानते थे लेकिन वह ब्राह्मणवाद के खिलाफ संघर्ष करने को बिल्कुल भी तैयार नहीं थे जबकि डॉ आंबेडकर ब्राह्मणवाद और पूंजीवाद दोनों को भारत के मेहनतकशों का दुश्मन मानते थे 12 से 23 फरवरी 1938 को मनवाड में अस्पृश्य रेलवे कामगार सभा की अध्यक्षता करते हुए डॉक्टर अंबेडकर ने कहा था "भारतीय मजदूर वर्ग ब्राह्मणवाद और पूंजीवाद दोनों का शिकार है और इन दोनों व्यवस्थाओं पर एक ही सामाजिक समूह का वर्चस्व है लेकिन कांग्रेस, सोशलिस्ट और वामपंथी तीनों अस्पृश्य कामगारों के विशेष दुश्मनों ब्राह्मणवाद से संघर्ष करने को तैयार नहीं है" (डॉ अंबेडकर फरवरी 1938 मनमाड)
बाबासाहेब ने इस देश के मजदूरों के लिए इतना कुछ किया लेकिन फिर भी उन्हें मजदूर नेता के रूप में मान्यता नहीं मिल पाई साजिश के तहत उन्हें सिर्फ दलितों के नेता तक सीमित कर दिया गया ना ही मजदूरों पर उनके काम को पढ़ने दिया गया और ना ही कभी उनके समूल्य योगदान को दुनिया के सामने सही ढंग से प्रस्तुत किया लेकिन सच ज्यादा समय तक शुप नहीं पाता बाबा साहब जैसे महानायक को आज पूरी दुनिया सलाम कर रही है
जय भीम जय भारत
On April 13, 2023, the birthday of Dr. Bhimrao Ambedkar was celebrated with great enthusiasm at the Bhim Rao Ambedkar Social Educational and Welfare Club Bhasaur (Reg. DIC/DRA 14119 OF 2019) in the village of Bhasaur. This event is commemorated annually, and its focus is to inspire children towards education. The program was graced by the presence of Dr. Makhan Singh, a retired Deputy Director from the Health Department of Punjab, who attended as the chief guest. Additionally, Sardar Pavitar Singh, the former District BSP President Sangrur, Sardar Amrik Singh Kanth, the District BSP President Sangrur, Malvinder Singh, the Halka Dhuri BSP President, and Principal Gurbakhsh Singh Ji were present at the event. The speakers at the program informed the audience about Dr. Bhimrao Ambedkar's ideology and the significant works he accomplished during his lifetime. Singer Preet Kaur Dhuri captivated everyone's attention with her beautiful songs, while the children's performances ad...





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