. . . . . . . . . इतिहास में 4 मई . . . . . . . . . .
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आज के दिन यानि 4 मई 1799 को अंग्रेजों के साथ लड़ते हुए मैसूर के हुकमरान टीपू सुलतान की श्रीरंगापट्टण में मौत हुई थी। टीपू सुलतान भारत के कुछ चुनिंदा शासकों में से हैं जो अंग्रेजों से ना डरे, ना उनके सामने झुके बल्कि युद्ध में मुकाबिला करते हुए वीरगती को प्राप्त हुए। उस वक्त के गजट से निकले तथ्य इसकी गवाही देते हैं कि टीपू सुलतान ने मंदिरों और प्रतीकों की भी रक्षा की। राजनीतिक हितों के मद्देनजर भाजपा टीपू सुल्तान की जयंती मनाने का विरोध करती रही है लेकिन वहां के लोग उसे शेर-ए-मैसूर के नाम से जानते हैं। वर्तमान इतिहासकार मानते हैं कि भारत में मिसाइल या राॅकेट टेक्नोलाॅजी का प्रारंभिक ज्ञान टीपू और उनके पिता हैदर अली का ही लाया हुआ है।
आज ही के दिन यानि 4 मई 1946 को जनरल मोहन सिंह को लाल किले से रिहा किया गया था। ये वो शख्स था जिसने 1941 को मलाया में आजाद हिंद फौज का गठन किया था। उसमें 55000 जवान थे। जब गिरफतारी के समय मोहन सिंह ने इसे तोड़ा उस समय 45000 की फौज थी। सुभाष चंद्र बोस ने बाद में इसे पुनर्जीवित किया तो 80 फीसदी जवानों ने दोबारा इसमें शामिल होने से इंकार कर दिया। जो फौज तैयार हुई उसमें मुश्किल से 7000 जवान थे। फिर भी सुभाष चंद्र बोस को आजाद हिंद फौज का बानी मान लिया गया। क्या ये इतिहास और पंजाबी सिक्खों के साथ ना इंसाफी नहीं?
आज ही के दिन यानि 4 मई 1955 को बाबा साहेब ने भारतिय बुद्धिस्ट सोसाइटी की नींव रखी। द बुद्धिस्ट सोसाइटी आॅफ इंडिया के नाम से इसको पंजीकृत करवाया गया।
दर्शन सिंह बाजवा
संपादक अंबेडकरी दीप

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