. . . . . . . . . इतिहास में 22 मई . . . . . . . . . .
आज के दिन यानि 22 मई 1987 को पी.ए.सी. (Provincial Armed Constabulary) द्वारा मेरठ के हाश्मिपुरा से 15 से 25 साल तक के 47 मुस्लिम युवकों को जबरदस्ती अपने टरक्कों में बिठा लिया गया। इन सब को नदी के किनारे लिजा कर गोलियों से भून दिया गया। इन में से 42 नौजवान मौके पर ही दम तोड़ गए। इतिहास के पन्नों में 22 मई, 1987 की रात थी। प्रांतीय सशस्त्र बलों (पीएसी) का URU1493 नंबर का ट्रक चला जा रहा था। थ्री नॉट थ्री राइफल लिए 19 जवान दूर से ट्रक पर खड़े दिखाई दे रहे थे। जो नहीं दिख रहे थे वो थे ट्रक में सिर नीचे किए बैठे 50 मुस्लिम लड़के। सब के सब घर से अलविदा की नमाज़ अदा करने निकले थे। पीएसी के प्लाटून कमांडर सुरिंदर पाल सिंह 19 जवानों के साथ मेरठ के हाशिमपुरा मोहल्ला पहुंचे। अलविदा की नमाज़ हो चुकी थी। सेना ने पहले से करीब 644 लोगों को पकड़ रखा था। इनमें से हाशिमपुरा के 150 मुसलमान नौजवान थे। इन्हें पीएसी के हवाले कर दिया गया। भीड़ में से औरतों और बच्चों को अलग कर घर भेज दिया गया। बताया जाता है कि करीब 50 लोगों को पीएसी अपने साथ ले गई। इनमें ज़्यादातर दिहाड़ी मजदूर और बुनकर थे। पुलिस की पिटाई में कुछ ने दम तोड़ दिया। बाकी बचे लोग ट्रक में इस तरह से बैठे थे कि दूर से दिखाई न पड़ें। ट्रक मुरादनगर के गंगा ब्रिज पर पहुंचा और तीन लोगों को गोली मार कर नहर में फेंक दिया गया। जो बाकी बचे उन्हें अपनी नियति का अंदाज़ा लग चुका था। सबने ऊपर वाले को याद किया और हाथापाई करने की ‘आखिरी कोशिश’ की। जैसे ही भीड़ खड़ी हुई, राइफल की गोलियों ने सब को भून दिया। लाशें नहर में ठिकाने लगा दी गईं। कुल 42 लोगों को मारा गया। उस समय कांग्रेस के श्री राजीव गांधी प्रधानमंत्री थे। वो हाशिमपुरा के दौरे पर पहुंचे। मुख्यमंत्री वीर बहादुर सिंह से भी जवाब-तलबी हुई। मगर 1988 तक वो मुख्यमंत्री बने रहे। जस्टिस राजिंदर सच्चर, आइ.के. गुजराल की सदस्यता वाली जांच समिति बनी। 1994 में समिति ने अपनी रिपोर्ट फाइल की। 1 जून 1995 को 19 अधिकारियों को दोषी मानकर मुकदमा चलाया गया। और इसके बाद तारीख पे तारीख और तारीख।
21 मार्च 2015 को दिल्ली की तीस हज़ारी कोर्ट ने 16 आरोपियों को ‘बाइज़्ज़त बरी’ कर दिया। तीन आरोपी इस दौरान मर गए थे। ये तीस हज़ारी कोर्ट की उस समय पर सबसे लंबे समय तक चलने वाली ट्रायल थी। 27 साल और 161 गवाहों के बयानों बाद भी देश के कानून को ये पता नहीं चला कि आखिर नहर में तैरती उन लाशों का ज़िम्मेदार कौन था। हालांकि इसके बाद उत्तर प्रदेश सरकार की तरफ से पीड़ित परिवारों को 5-5 लाख का मुआवज़ा दिया गया मगर जो देश की धर्मनिरपेक्षता पर जो ज़ख्म लगा उसकी भरपाई की फिक्र किसी ने नहीं की।
हाशिमपुरा में शामिल कोई भी जवान कभी निलंबित नहीं हुआ। कुछ को तो तरक्की भी मिली। पुलिस वालों की निर्लज्जता का जो खाका ज़िंदा बच गए लोगों ने खींचा है वो बताता है कि इन पुलिस वालों को सज़ा का कोई डर नहीं था। आखिरकार ये बात साबित भी हो गई।
ये नरसंहार साबित करता है कि बात जब सियासी ध्रुवीकरण और उससे उपजे उन्माद को संभालने की आती हो तो सियासी पार्टियों का रुख कमोबेश एक सा ही रहता है।
दर्शन सिंह बाजवा
संपादक अंबेडकरी दीप

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