. . . . . . . . . इतिहास में 18 मई . . . . . . . . . .
- - - - - - -*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-* - - - - - - - - -
आज के दिन यानि 18 मई 1974 को श्रीमती इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्री काल में राजस्थान के पोखरण में भारत द्वारा अपना पहला भूमिगत परमाणु बम परीक्षण किया गया था। उस दिन बुद्ध जयंती थी। इसलिए इस परीक्षण को स्माइलिंग बुद्धा का नाम दिया गया। कैसी गहरी चाल चलते हैं मनुवादी लोग कि विनाश के बीज को शान्ति के दूत बुद्धा का नाम देने लगे।
गूगल पर पहले प्रमाणू परीक्षण के बारे में सर्च करने पर आपको जो मिलता है वो इस तरह है -अंतत: मचान के पास मौजूद लाउड स्पीकर से उल्टी गिनती शुरू हुई। सेठना और रमन्ना ने ट्रिगर दबाने का गौरव प्रणव दस्तीदार को दिया।
जैसे ही पाँच की गिनती हुई प्रणव ने हाई वोल्टेज स्विच को ऑन किया। दस्तीदार के पैरों से ज़मीन निकल गई जब उन्होंने अपनी बाईं तरफ़ लगे इलेक्ट्रीसिटी मीटर को देखा।
मीटर दिखा रहा था कि निर्धारित मात्रा का सिर्फ़ 10 फ़ीसदी वोल्टेज ही परमाणु डिवाइस तक पहुँच पा रहा था। उनके सहायकों ने भी ये देखा। वो घबराहट में चिल्लाए, "शैल वी स्टॉप ? शैल वी स्टॉप?" हड़बड़ी में गिनती भी बंद हो गई।
लेकिन दस्तीदार का अनुभव बता रहा था कि शॉफ्ट के अंदर अधिक आद्रता की वजह से ग़लत रीडिंग आ रही है। वो चिल्लाए, "नो वी विल प्रोसीड।"
जॉर्ज परकोविच अपनी किताब इंडियाज़ न्यूकिल्यर बॉम्ब में लिखते हैं आठ बज कर पाँच मिनट पर दस्तीदार ने लाल बटन को दबाया।
उधर मचान पर मौजूद सेठना और रमन्ना ने जब सुना कि गिनती बंद हो गई है तो उन्होंने समझा कि विस्फोट को रोक दिया गया है। रमन्ना इयर्स ऑफ़ पिलग्रिमेज में लिखते हैं कि उनके साथी वैंकटेशन ने जो इस दौरान लगातार विष्णु सहस्रनाम का पाठ कर रहे थे, अपना जाप रोक दिया था।
अभी सब सोच ही रहे थे कि उनकी सारी मेहनत बेकार गई है, कि अचानक धरती से रेत का एक पहाड़ सा उठा और लगभग एक मिनट तक हवा में रहने के बाद गिरने लगा। बाद में पी के आएंगर ने लिखा, "वो ग़ज़ब का दृश्य था। अचानक मुझे वो सभी पौराणिक कथाएं सच लगने लगी थीं जिसमें कहा गया था कि कृष्ण ने एक बार पर्वत को अपनी उंगली पर उठा लिया था।"
तभी सभी ने महसूस किया मानो एक ज़बरदस्त भूचाल आया हो। सेठना को भी लगा कि धरती बुरी तरह से हिल रही है। लेकिन उन्होंने सोचा कि विस्फोट की आवाज़ क्यों नहीं आ रही ? या उन्हें ही सुनाई नहीं पड़ रहा ? (रीडिफ़.कॉम से बातचीत- 8 सितंबर 2006)
लेकिन एक सेकेंड बाद विस्फोट की दबी हुई आवाज़ सुनाई पड़ी। चिदंबरम, सिक्का और उनकी टीम ने एक दूसरे को गले लगाना शुरू कर दिया। चिदंबरम ने बाद में लिखा, ''ये मेरे जीवन का सबसे बड़ा क्षण था।''
कंट्रोल रूम में मौजूद श्रीनिवासन को लगा जैसे वो ज्वार भाटे वाले समुद्र में एक छोटी नाव पर सवार हों जो बुरी तरह से डगमगा रही हो। रमन्ना ने अपनी आत्मकथा में लिखा, "मैंने अपने सामने रेत के पहाड़ को ऊपर जाते हुए देखा मानो हनुमान ने उसे उठा लिया हो।"
लेकिन वो इस उत्तेजना में भूल गए थोड़ी देर में धरती कांपने वाली है। उन्होंने तुरंत ही मचान से नीचे उतरना शुरू कर दिया। जैसे ही धरती हिली मचान से उतर रहे रमन्ना अपना संतुलन नहीं बरक़रार रख पाए और वो भी ज़मीन पर आ गिरे।
ये एक दिलचस्प इत्तेफ़ाक़ था कि भारत के परमाणु बम का जनक, इस महान उपलब्धि के मौक़े पर पोखरण की चिलचिलाती गर्म रेत पर औंधे मुँह गिरा पड़ा था।
सिर्फ़ इसी मक़सद से सेना ने वहाँ पर प्रधानमंत्री कार्यालय के लिए ख़ास हॉट लाइन की व्यवस्था की थी। पसीने में नहाए सेठना का कई प्रयासों के बाद प्रधानमंत्री कार्यालय से संपर्क स्थापित हुआ।
दूसरे छोर पर प्रधानमंत्री के निजी सचिव पी एन धर थे। सेठना बोले, "धर साहब एवरी थिंग हैज़ गॉन... " तभी लाइन डेड हो गई।
सेठना ने समझा कि धर को लगा होगा कि परीक्षण फ़ेल हो गया है। उन्होंने सेना की जीप उठाई और लेफ़्टिनेंट कर्नल पीपी सभरवाल के साथ बदहवासों की तरह ड्राइव करते हुए पोखरण गाँव पहुँचे जहाँ सेना का एक टेलिफ़ोन एक्सचेंज था।
वहाँ पहुँच कर सेठना ने अपना माथा पीट लिया जब उन्होंने पाया कि वो धर का डाएरेक्ट नंबर भूल आए हैं.
यहाँ सभरवाल उनकी मदद को आगे आए। उन्होंने अपनी सारी अफसरी अपनी आवाज़ में उड़ेलते हुए टेलिफ़ोन ऑपरेटर से कहा, "गेट मी द प्राइम मिनिस्टर्स ऑफ़िस।"
काफ़ी मशक्क़त और हील हुज्जत के बाद आख़िरकार प्रधानमंत्री कार्यालय से संपर्क हुआ.
बहुत ख़राब लाइन पर लगभग चीखते हुए सेठना ने वो मशहूर कोड वर्ड कहा, "बुद्धा इज़ स्माइलिंग।"
दर्शन सिंह बाजवा
संपादक अंबेडकरी दीप

टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें