. . . . . . . . . इतिहास में 15 मई . . . . . . . . .
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आज के दिन यानि 15 मई 1881 को दलित पिछड़े वर्गों की शिक्षा का विरोध करते हुए कांग्रेस के बड़े नेता बाल गंगाधर तिल्क ने अपने मराठा अखबार में कहा था, "आप किसान के बेटे को हल चलाने, तेली के बेटे को तेल निकालने, लुहार के बेटे को धौंकनी से, मोची के बेटे को रांबी आर के काम से पकड़ कर आधुनिक शिक्षा देने के लिए ले जायोगे और लड़का अपने पिता के पेशे की अलोचना करना सीखकर आएगा। उसको अपने खानदानी और पुराने पेशे का सहयोग नहीं मिलेगा। ऐसा करने पर वो रोजगार के लिए सरकार की तरफ देखेगा। आप उसको उस माहौल से अलग कर दोगे जिससे वो जुड़ा हुआ है, खुश है और उनके लिए उपयोगी है। जो उनपे निर्भर है। उनकी बहुत सी चीजों से आप उनको दूर कर दोगे।" मतलब कि तिलक जी चाहते थे कि हर व्यक्ति अपना पुश्तैनी काम करता रहे। यानि कि वे मनुस्मृति के आधार पर व्यवस्था चाहते थे।
ये तिलक जी ही थे जिन्होंने हमारे वोट के अधिकार का विरोध करते हुए कहा था कि "मुझे नहीं मालूम ये तेली, तंबोली, मोची और कुनबी संसद में क्यों जाना चाहते हैं ? तेली क्या तेल निकालेगा, तंबोली क्या कपड़े सियेगा, मोची क्या जूते सिलेगा, कुनबी क्या संसद में हल चलाएगा ?" यानि तिलक जी चाहते थे कि सभी जातियों के लोग अपना पुश्तैनी काम करते रहें। संसद में जाने का और हुकूमत करने का अधिकार तो सिर्फ़ सवर्ण जातियों का है।
भले ही तिलक जी कांग्रेसी नेता थे और आज कांग्रेस सत्ता से बाहर है लेकिन तिलक की विचारधारा को मानने वाले ही आज सत्ता में हैं। पता नहीं हमारा समाज कब समझेगा कि उन्हें संसद में भी जाना है और हुकूमत भी करना है।
दर्शन सिंह बाजवा
संपादक अंबेडकरी दीप

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