. . . . . . . . . इतिहास में 21 अप्रैल . . . . . . . . . .
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आज के दिन यानि 21 अप्रैल 1850 को सिख धर्म के एक महान बुद्धिजीवी ज्ञानी दित्त सिंह का जन्म हुआ था। ज्ञानी जी पंजाबी के पहले प्रोफेसर थे और पंजाबी पत्रकारिता के पितामह थे। उन्होंने 51 साल की उम्र तक 52 पुस्तकें लिखीं। वो खालसा कॉलेज अमृतसर के संस्थापक सदस्य थे। ज्ञानी जी ने आर्य समाज के बानी स्वामी दयानंद सरस्वती को विचार चर्चा में हराया था। वो भी एक बार नहीं बल्कि तीन बार। ज्ञानी जी के सवालों का स्वामी दयानंद सरस्वती के पास कोई जवाब नहीं था। लेकिन बहुत ही दुख की बात है कि सिख समाज के लोग उनके नाम पर कोई बड़ी संस्था नहीं बना सके। जबकि हारने वाले के नाम पर लुधियाना में दयानंद मैडीकल कॉलेज (डीएमसी) बनाया गया है। इसके अलावा कितने ही स्कूल और कॉलेज जो उनके नाम पर बने हुए हैं, उनकी तो गिनती ही नहीं है। मन को तब कुछ खुशी हुई जब मैंने हमारे पास के एक गांव अलाल में एक पार्क का नाम ज्ञानी जी के नाम पर देखा। यह पार्क वहां के सरपंच सरबजीत सिंह ने बनवाया था। काश कि सिखों की सबसे बड़े बजट वाली और सिखों की मिन्नी पार्लियामेंट कहलाने वाली संस्था शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी इस ओर ध्यान दे।
Giani Ditt Singh was a historian, scholar, poet, editor and an eminent Singh Sabha reformer. Singh wrote over 70 books on Sikhism, the most famous of which is Khalsa Akhbar. His Dayanand naal mera Samvaad and Durga Parbodh are considered major texts of Sikh philosophy.
आज ही के दिन यानि 21 अप्रैल 2010 को हरियाणा में मिर्चपुर कांड हुआ था। घटना यूं है कि गांव मिर्चपुर में ऊंची जाति के कुछ लड़के दलितों की बस्ती में घूम रहे थे। वहां का एक कुत्ता उन लड़कों पर भौंका तो उच्च जाती लड़के ने उसे पत्थर मार दिया। पत्थर मारने का एक दलित लड़के ने विरोध किया तो उच्च जातियों ने दलितों को सबक सिखाने के लिए हजूम की शक्ल में दलितों की बस्ती पर हमला कर दिया। घरों को आग के
कर दिया गया। एक अपंग लड़की सुमन समेत दो व्यक्ति मारे गए और अनेकों जख्मी हुए। सरकार ने दलित वर्ग की सुरक्षा के लिए कोई इन्तजाम नहीं किया। असहाय दलितों को आखिर गांव छोड़ कर भागना पड़ा।
दर्शन सिंह बाजवा
संपादक अंबेडकरी दीप

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